किसको क़ातिल मैं कहूँ किसको मसीहा समझूँ,
सब यहाँ दोस्त ही बैठे हैं किसे क्या समझूँ ।
वो भी क्या दिन थे कि हर वहम यक़ीं होता था,
अब हक़ीक़त नज़र आए तो उसे क्या समझूँ ।
दिल जो टूटा तो कल हाथ दुआ को उठे,
ऐसे माहौल में अब किसको पराया समझूँ ।
ज़ुल्म ये है के है यक़ता तेरी बेगानारवी,
लुत्फ़ ये है के मैं अब तक तुझे अपना समझूँ ।
Sunday, January 10, 2010
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